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                                      रक्षा बंधन पर विशेष 

बहना ने भाई की कलाई से प्यार बाँधा है, प्यार के दो तार से संसार बाँधा है... सुमन कल्याणपुर द्वारा गाया गया यह गाना रक्षाबंधन का बेहद चर्चित गाना है। भले ही ये गाना बहुत पुराना न हो पर भाई की कलाई पर राखी बाँधने का सिलसिला बेहद प्राचीन है। रक्षाबंधन का इतिहास सिंधु घाटी की सभ्यता से जुड़ा हुआ है। वह भी तब जब आर्य समाज में सभ्यता की रचना की शुरुआत मात्र हुई थी। 

रक्षाबंधन पर्व पर जहाँ बहनों को भाइयों की कलाई में रक्षा का धागा बाँधने का बेसब्री से इंतजार है, वहीं दूर-दराज बसे भाइयों को भी इस बात का इंतजार है कि उनकी बहना उन्हें राखी भेजे। उन भाइयों को निराश होने की जरूरत नहीं है, जिनकी अपनी सगी बहन नहीं है, क्योंकि मुँहबोली बहनों से राखी बंधवाने की परंपरा भी काफी पुरानी है। 


असल में रक्षाबंधन की परंपरा ही उन बहनों ने डाली थी जो सगी नहीं थीं। भले ही उन बहनों ने अपने संरक्षण के लिए ही इस पर्व की शुरुआत क्यों न की हो लेकिन उसी बदौलत आज भी इस त्योहार की मान्यता बरकरार है। इतिहास के पन्नों को देखें तो इस त्योहार की शुरुआत की उत्पत्ति लगभग 6 हजार साल पहले बताई गई है। इसके कई साक्ष्य भी इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं।







 राखी का क्या मतलब है ? 

राखी के त्योहार को रक्षाबन्धन भी कहते हैँ| राखी एक धागे की डोर है जिसको बहन भाई की कलाई पर प्रेम पूर्वक बाधती है और सदा विजयी होने का आर्शीवाद देती है| भाई बहन की रक्षा के बन्धन में डोर से लिपट जाता है| यह त्योहार बहन भाई के रिश्ते को सदा जीवित रखता है और प्रेम में बान्धे रखता है| 

इस त्योहार के साथ भी कई कहानियाँ जुडी हुई हैं कि कैसे यह त्योहार मनाना शुरु हुआ| एक बार राजा इन्द्र की राक्षसों से लडाई छिड गई| लडाई कई दिनों तक होती रही| न राक्षस हारने में आते थे, न इन्द्र जीतते दिखाई देते थे| इन्द्र बडे सोच मे पडे| वह अपने गुरु वृहस्पति के पास आकर बोले ,"गुरुदेव, इन राक्षसो से मैं न जीत सकता हूँ न हार सकता हूँ | न मैं उनके सामने ठहर सकता हूँ न भाग सकता हूँ| इसलिये मैं आपसे अन्तिम बार आर्शीवाद लेने आया हूँ| अगर अबकी बार भी मैं उन्हें हरा न सका तो युद्ध में लडते लडते वहीं प्राण दे दूँगा | 


इन्द्र को राखी किसने बांधी ? 

उस समय इन्द्राणी भी पास बैठी हुई थी इन्द्र को घबराया हुआ देखकर बोली, " पतिदेव, मै ऐसा उपाय बताती हूँ जिससे इस बार आप अवश्य लडाई में जीतकर आयेगे| इसके बाद इन्द्राणी ने गायत्री मंत्र पढ़कर इन्द्र के दाहिने हाथ मे एक डोरा बाँध दिया और कहा, पतिदेव यह रक्षाबन्धन मै आपके हाथ में बाँधती हूँ| यह रक्षा का बन्धन आपके हाथ में बांधती हूँ| इस रक्षाबन्धन को पहन कर एक बार फिर युद्ध में जाये | इस बार अवश्य ही आपकी विजय होगी| इन्द्र अपनी पत्नी की बात को गाँठ बांधकर और रक्षा बन्धन को हाथ में बधवाकर चल पडा| इस बार लडाई के मैदान में इन्द्र को ऐसा लगा जैसे वह अकेला नही लड रहा इन्द्राणी भी कदम से कदम मिलाकर उसके साथ लड रही है| उसे ऍसा लगा कि रक्षाबन्धन का एक एक तार ढ़ाल बन गया है और शत्रुओं से उसकी रक्षा कर रहा है| इन्द्र जोर शोर से लडने लगा| इस बार सचमुच इन्द्र की विजय हुई | तब से लेकर रक्षाबन्धन का त्योहार चल पडा| यह त्योहार सावन की पूर्णिमा को मनाया जाता है इसलिये इसे सावनी या सूलनो भी कहते है| 


इसके अतिरिक्त और भी कोई राखी की कहानी है क्या? 

 हाँ और भी इसका महत्व हैजो कि हमारे ऋषि मुनियों ने समझा सावन का महिना ऋषि मुनि लोग गाँवों और नगरौ मे बिताते थे| वह लोगो को उपदेश देते थे| लोग गुरु मंत्र लेने के लिये यज्ञ में आते थे| ऋषि लोग सच्चाई पर चलने का अच्छे कर्म करने का उपदेश देते थे| उस बात का संकल्प करने के लिये वे भक्तो के दाये हाथ मे मौली के धागे से गाँठ और गले मे जनेऊ की गाँठ बाँध देते थे जो उन्हें जिन्दगी मे कदम कदम पर गुरु शिक्षा की याद दिलाती रहती थीकि कहीं अपना वायदा न भूलें| सच्चाई और अच्छाई की राह पर चलने का| आजकल पुरोहित लोग अपनें यजमानों को राखी बाँधते है| 

 बहने कब से भाई को राखी बाँधने लगी यह कब से आरम्भ हुआ ? 

वास्तव मे बहन के भाई को राखी बाँधने की प्रथा राजस्थान से शुरु हुई |उनमे यह रिवाज हो गया है कि यदि किसी औरत पर कोई मुसीवत आती थी तो वह किसी वीर पुरुष को अपना भाई कहकर राखी भेज दिया करती थौ | राखी का मत होता था बहिन की रक्षा का भार उठाना | कहते हैं कि एक बार रानी कर्णवती ने बादशाह हुमायूं को इसी उद्देश्य से राखी भेजी थी | वह मुसलमान था फिर भी राखी का न्योता पाकर वह अपनी मुँह बाली बहिन की रक्षा के लिये चल पडा था | तब से बहिनें अपने भाइयों के हाथों में राखी बाधने लगी है| 

आजकल राखौ के दिन सुन्दर सुन्दर राखियाँ बनाई जाती हैं| घरों में मीठे भोजन और पकवान बनाये जाते है| बहिनें भाइयों के राखी बाँधती हैं| रक्षाबन्धन का त्योहार बहन भाइयों के रिश्ते को मजबूत करता है| राखी के त्योहार का अर्थ बहुत गहरा है| यह एक दूसरे के प्रति प्यार, विश्चास, आशा. बलिदान , को जाग्रत करता है|ऍसी भावनाओ को पैदा करता है कि बहन अपने भाई के लिये सदा मंगल कामना करती है व भाई बहिन के लिये रक्षा के वायदे करता है| बहिन तरह तरह की मिठाइयाँ प्यार से बटोर कर भाई को केसर का टीका लगाकर राखी को प्यार के डोरो को भाई की कलाई पर बांधती है और आर्शीवाद देती है भाई बहिन को आर्शीवाद देता है व भेंट मे कुछ उपहार देता है| तरह तरह के पकवान बनाये जाते है| सब खुशी से खाते पीते है |यह प्यार का त्योहार है जो रिश्ते नाते जोडता है| 





रक्षाबंधन की शुरुआत का सबसे पहला साक्ष्य रानी कर्णावती व सम्राट हुमायूँ हैं। मध्यकालीन युग में राजपूत व मुस्लिमों के बीच संघर्ष चल रहा था। रानी कर्णावती चितौड़ के राजा की विधवा थीं। उस दौरान गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह से अपनी और अपनी प्रजा की सुरक्षा का कोई रास्ता न निकलता देख रानी ने हुमायूँ को राखी भेजी थी। तब हुमायूँ ने उनकी रक्षा कर उन्हें बहन का दर्जा दिया था। 

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दूसरा उदाहरण अलेक्जेंडर व पुरू के बीच का माना जाता है। कहा जाता है कि हमेशा विजयी रहने वाला अलेक्जेंडर भारतीय राजा पुरू की प्रखरता से काफी विचलित हुआ। इससे अलेक्जेंडर की पत्नी काफी तनाव में आ गईं थीं। 

उसने रक्षाबंधन के त्योहार के बारे में सुना था। सो, उन्होंने भारतीय राजा पुरू को राखी भेजी। तब जाकर युद्ध की स्थिति समाप्त हुई थी। क्योंकि भारतीय राजा पुरू ने अलेक्जेंडर की पत्नी को बहन मान लिया था। 

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इतिहास का एक अन्य उदाहरण कृष्ण व द्रोपदी को माना जाता है। कृष्ण भगवान ने दुष्ट राजा शिशुपाल को मारा था। युद्ध के दौरान कृष्ण के बाएँ हाथ की अँगुली से खून बह रहा था। इसे देखकर द्रोपदी बेहद दुखी हुईं और उन्होंने अपनी साड़ी का टुकड़ा चीरकर कृष्ण की अँगुली में बाँधा जिससे उनका खून बहना बंद हो गया। 

तभी से कृष्ण ने द्रोपदी को अपनी बहन स्वीकार कर लिया था। वर्षों बाद जब पांडव द्रोपदी को जुए में हार गए थे और भरी सभा में उनका चीरहरण हो रहा था तब कृष्ण ने द्रोपदी की लाज बचाई थी।





क्या है रक्षा बंधन 
रक्षाबंधन का त्योहार श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। भगवान विष्णु ने वामन अवतार धारण कर बलि राजा के अभिमान को इसी दिन चकानाचूर किया था। इसलिए यह त्योहार 'बलेव' नाम से भी प्रसिद्ध है। महाराष्ट्र राज्य में नारियल पूर्णिमा या श्रावणी के नाम से यह त्योहार विख्यात है। इस दिन लोग नदी या समुद्र के तट पर जाकर अपने जनेऊ बदलते हैं और समुद्र की पूजा करते हैं।

रक्षाबंधन के संबंध में एक अन्य पौराणिक कथा भी प्रसिद्ध है। देवों और दानवों के युद्ध में जब देवता हारने लगे, तब वे देवराज इंद्र के पास गए। देवताओं को भयभीत देखकर इंद्राणी ने उनके हाथों में रक्षासूत्र बाँध दिया। इससे देवताओं का आत्मविश्वास बढ़ा और उन्होंने दानवों पर विजय प्राप्त की। तभी से राखी बाँधने की प्रथा शुरू हुई। दूसरी मान्यता के अनुसार ऋषि-मुनियों के उपदेश की पूर्णाहुति इसी दिन होती थी। वे राजाओं के हाथों में रक्षासूत्र बाँधते थे। इसलिए आज भी इस दिन ब्राह्मण अपने यजमानों को राखी बाँधते हैं।

रक्षाबंधन का त्योहार भाई-बहन के पवित्र प्रेम का प्रतीक है। इस दिन बहन अपने भाई को प्यार से राखी बाँधती है और उसके लिए अनेक शुभकामनाएँ करती है। भाई अपनी बहन को यथाशक्ति उपहार देता है। बीते हुए बचपन की झूमती हुई याद भाई-बहन की आँखों के सामने नाचने लगती है। सचमुच, रक्षाबंधन का त्योहार हर भाई को बहन के प्रति अपने कर्तव्य की याद दिलाता है।

राखी के इन धागों ने अनेक कुरबानियाँ कराई हैं। चित्तौड़ की राजमाता कर्मवती ने मुग़ल बादशाह हुमायूँ को राखी भेजकर अपना भाई बनाया था और वह भी संकट के समय बहन कर्मवती की रक्षा के लिए चित्तौड़ आ पहुँचा था। आजकल तो बहन भाई को राखी बाँध देती है और भाई बहन को कुछ उपहार देकर अपना कर्तव्य पूरा कर लेता है। लोग इस बात को भूल गए हैं कि राखी के धागों का संबंध मन की पवित्र भावनाओं से हैं।

Sanjay Dutt


संजय दत्त : जन्म दिन : 29 जुलाई 
एक सफल नायक वही होता है जो हर तकलीफ सहकर और हर मुसीबत का सामना करके दुबारा अपने काम पर लौट आए. जब भी वह नीचे गिरे तो कुछ यूं उठे कि पहले से भी ऊपर जाए. हिन्दी सिनेमा जगत में ऐसा ही किया है अभिनेता संजय दत्त ने. एक अभिनेता, खलनायक, गायक और नेता के रोल में खुद को फिट करने वाले संजय दत्त ने कभी भी किसी चीज से हार नही मानी. जवानी में अवैध एके-47 रखने के चक्कर में आज भी संजय दत्त को जेल के चक्कर लगाने पड़ते हैं लेकिन फिर भी वह बॉलिवुड से खुद को मजबूती से जोड़े हुए हैं.

Sanjay dutt and his family संजय दत्त का जीवन
संजय दत्त मशहूर अभिनेता सुनील दत्त और अभिनेत्री नरगिस के बेटे हैं. 29 जुलाई, 1959 को जन्मे संजय दत्त ने अपनी पढ़ाई लॉरेंस स्कूल, सानावार (Lawrence School Sanawar) से की.  संजय दत्त की बहन प्रिया दत्त हैं जो अब राजनीति में सक्रिय हैं और उनकी एक और बहन नम्रता दत्त हैं जिन्होंने अभिनेता कुमार गौरव से शादी की है. संजय दत्त अपने माता-पिता के बड़े दुलारे थे क्यूंकि वह अपने भाई-बहनों में सबसे बड़े थे.

संजय दत्त के जीवन में उनके पिता सुनील दत्त का बहुत बड़ा रोल है. संजय दत्त के कॅरियर को संवारना हो या कानूनी पचड़े से निकालना, हर जगह उनके पिता ने ही उन्हें सहारा दिया. संजय दत्त भी अपने पिता का बड़ा मान रखते थे.

Sanjay dutt संजय दत्त का कॅरियर
संजय दत्त ने 13 साल की उम्र में ही फिल्म “रेशमा और शेरा” में एक बाल कलाकार की भूमिका निभाई थी. संजय दत्त ने इसके बाद 1981 में फिल्म “रॉकी” से अपने फिल्मी कॅरियर की शुरुआत की. यह फिल्म एक हिट साबित हुई थी लेकिन इस फिल्म के बाद ही उनकी मां नरगिस की मृत्यु हो गई थी. मां की मौत का सदमा संजय दत्त बर्दाश्त नहीं कर पाए और तन्हाई को मिटाने के लिए उन्होंने ड्र्ग्स का सहारा लेना शुरू कर दिया. ड्रग्स की वजह से उनसे कई फिल्में छूट गईं. इसके बाद उनके पिता सुनील दत्त ने उन्हें यूएस के एक नशामुक्ति केन्द्र भेजा जहां से लौट कर उन्होंने कई सुपरहिट फिल्में दीं. 80 से 90 के समय तक संजय दत्त ने नाम, विधाता, जीवा, ताकतवर जैसी कई हिट फिल्मों में अभिनय किया. अपने स्टाइल और युवा शैली की वजह से वह बहुत जल्दी दर्शकों में प्रसिद्ध हो गए.

1990 में आई फिल्म “सड़क” और “खून का कर्ज” भी हिट साबित हुई थी लेकिन साल 1991 में आई फिल्म “साजन” में उनके अभिनय को सराहना के साथ फिल्मफेयर का नामांकन भी मिला. फिर वह साल आया जिसने संजय दत्त की जिंदगी को पूरी तरह बदल दिया.

Sanjay-Duttसंजय दत्त और ए के 47 का खेल
निर्देशक सुभाष घई ने फिल्म “खलनायक” में संजय दत्त को एक सशक्त भूमिका दी जिसे संजय दत्त ने अपने अभिनय से और भी सजा दिया. लेकिन फिल्म की रिलीज के समय ही 19 अप्रैल, 1993 को उन्हें टाडा के तहत अवैध रुप से हथियार रखने के जुर्म में गिरफ्तार कर लिया गया और 18 महीने के लिए आर्थर जेल में भेज दिया गया. यह वह समय था जिसे शायद संजय दत्त की जिंदगी का सबसे कठिन समय माना जा सकता है. एक लंबे समय तक कोर्ट के चक्कर लगाने के बाद उन्हें 1995 में छोड़ दिया गया. लेकिन अभी भी उनकी परेशानी कम नहीं हुई. साल 2006 में उन्होंने कबूल कर लिया कि उन्होंने कुछ हथियार गैर-कानूनी तौर से अपने पास रखे थे जिसके लिए उन्हें 6 साल जेल की सजा सुनाई गई. फिलहाल संजय दत्त जमानत पर हैं.

Khalnayakखलनायक हुई हिट
फिल्म “खलनायक” में संजय दत्त ने एक ऐसे किरदार का रोल निभाया था जो पहले अच्छा होता है लेकिन हालात उसे बुरा बना देते हैं और इसी समय वह टाडा के तहत गिरफ्तार भी हो गए थे. अब इसे संयोग कहिए या किस्मत संजय दत्त की गिरफ्तारी और उनकी असल जिंदगी में खलनायिकी के किस्से ने फिल्म “खलनायक” को उनके कॅरियर की सर्वश्रेष्ठ फिल्म बना दी. इस फिल्म ने एक नए संजय दत्त को जन्म दिया जो पहले से ज्यादा समझदार और जिम्मेदार थे.

Sanjay_Madhuriमाधुरी और संजय दत्त
फिल्म “खलनायक” ने बॉलिवुड में माधुरी दीक्षित और संजय दत्त के बीच प्यार के किस्से को नई हवा दी. दोनों ने इससे पहले भी कई फिल्में की थीं जैसे साजन, थानेदार, कानून अपना अपना. दोनों की जोड़ी को बॉलिवुड की सबसे हॉट जोड़ियों में से एक माना जाता है. लेकिन जब से संजय दत्त ने जेल की हवा खाई है तभी से माधुरी ने भी कसम खा ली है कि वह कभी संजय दत्त के साथ काम नहीं करेंगी. वैसे खबर है कि संजय दत्त और माधुरी दीक्षित की जोड़ी “अग्निपथ” के रिमेक में नजर आएगी.
साल 1999 में फिल्म “वास्तव” ने उन्हें उनके कॅरियर का पहला फिल्मफेयर अवार्ड दिलाया. इसके बाद संजय दत्त ने कई हिट फिल्मे दीं जिनमें मिशन कश्मीर, जोड़ी नं 1, हथियार, कांटे, मुन्ना भाई एम.बी.बी.एस, दस, लगे रहो मुन्ना भाई जैसी सफल फिल्में शामिल हैं. फिल्म ‘मुन्ना भाई एम.बी.बी.एस’ के लिए उन्हें फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ हास्य कलाकार का अवार्ड भी मिला.

आज 51 साल के होने के बाद भी संजय दत्त बॉलिवुड में उसी जोश से काम कर रहे हैं जैसा वह पहले किया करते थे. संजय दत्त किसी भी रोल को छोटा नहीं समझते और यही कारण है कि वह आज भी बॉलिवुड में टिके हुए हैं और लगातार हिट फिल्में दिए जा रहे हैं. साल 2010 में उन्होंने “नो प्रॉब्लम” और इस साल उन्होंने “डबल धमाल” में अपने अभिनय से साबित कर दिया कि किसी भी रोल को निभा पाना उनके लिए नामुमकिन नहीं है.

संजय दत्त और राजनीति
संजय दत्त ने साल 2009 में समाजवादी पार्टी की तरफ से लोकसभा चुनावों में भी हिस्सा लिया और वह पार्टी के सदस्य बने. संजय दत्त और अमर सिंह की दोस्ती भी बीते दिनों काफी देखने में आई जब अमर सिंह की राह पर चलते हुए संजय दत्त ने भी समाजवादी पार्टी का दामन छोड़ दिया. अब तो संजय दत्त राजनीति से दूर ही रहने की कोशिश करते नजर आते हैं.

Sanjay Dutt weddingसंजय दत्त और मान्यता दत्त
संजय दत्त की पहली शादी साल 1989 में अभिनेत्री रिचा सिंह से हुई थी लेकिन 1996 में ब्रेन कैंसर से रिचा की मौत हो गई. इसके बाद साल 1998 में संजय दत्त ने मॉडल रिया पिल्लै (Rhea Pillai) से दूसरी शादी की लेकिन यह शादी भी 2005 में तलाक के साथ खत्म हो गई. साल 2008 में संजय दत्त ने मान्यता से शादी की जो उनकी दोस्त थीं. हाल ही में संजय दत्त के दो जुड़वा बच्चे हुए हैं. संजय दत्त की पहली बेटी का नाम त्रिशला है जो संजय दत्त को बहुत प्यारी है.

संजय दत्त ने आज बॉलिवुड में जो अपनी जगह बनाई है वह जगह बना पाना हर किसी के लिए आसान नहीं होता. एक लडाकू की तरह वह हर परेशानी का डटकर सामना करने के लिए जाने जाते रहे हैं. 50 के पार का होने के बाद भी संजय दत्त का जादू अभी खत्म नहीं हुआ है. साल 2011 में संजय दत्त कई फिल्मों में नजर आने वाले हैं जिनमें पावर, रा वन, अग्निपथ जैसी फिल्में शामिल हैं.
   संजय दत्त को हमारे वेबसाइट की ओर  से जन्म दिन  की बहुत -बहुत शुभकामनायें 
ये बहुत से लोगों का मानना है की महाभारत सिर्फ काल्पनिक कहानी है। मगर ये हकीकत में घटित हुवा था . इसके बहुत से प्रमाण मौजूद है . जैसे कुरुक्षेत्र , एवं बहुत सी क्रमवार घटनाये जो साबित करती है  
की महाभारत इतिहास की कहानी है . 
******************************नीचे के विवरण से ये स्पष्ट होता है *******************

महाभारत के बाद से आधुनिक काल तक के सभी राजाओं का विवरण क्रमवार तरीके से नीचे प्रस्तुत किया जा रहा है...!

आपको यह जानकर एक बहुत ही आश्चर्य मिश्रित ख़ुशी होगी कि महाभारत युद्ध के पश्चात् राजा युधिष्ठिर की 30 पीढ़ियों ने 1770 वर्ष 11 माह 10 दिन तक राज्य किया था..... जिसका पूरा विवरण इस प्रकार है :

क्र................... शासक का नाम.......... वर्ष....माह.. दिन

1. राजा युधिष्ठिर (Raja Yudhisthir)..... 36.... 08.... 25
2 राजा परीक्षित (Raja Parikshit)........ 60.... 00..... 00
3 राजा जनमेजय (Raja Janmejay).... 84.... 07...... 23
4 अश्वमेध (Ashwamedh )................. 82.....08..... 22
5 द्वैतीयरम (Dwateeyram )............... 88.... 02......08
6 क्षत्रमाल (Kshatramal)................... 81.... 11..... 27
7 चित्ररथ (Chitrarath)...................... 75......03.....18
8 दुष्टशैल्य (Dushtashailya)............... 75.....10.......24
9 राजा उग्रसेन (Raja Ugrasain)......... 78.....07.......21
10 राजा शूरसेन (Raja Shoorsain).......78....07........21
11 भुवनपति (Bhuwanpati)................69....05.......05
12 रणजीत (Ranjeet).........................65....10......04
13 श्रक्षक (Shrakshak).......................64.....07......04
14 सुखदेव (Sukhdev)........................62....00.......24
15 नरहरिदेव (Narharidev).................51.....10.......02
16 शुचिरथ (Suchirath).....................42......11.......02
17 शूरसेन द्वितीय (Shoorsain II)........58.....10.......08
18 पर्वतसेन (Parvatsain )..................55.....08.......10
19 मेधावी (Medhawi)........................52.....10......10
20 सोनचीर (Soncheer).....................50.....08.......21
21 भीमदेव (Bheemdev)....................47......09.......20
22 नरहिरदेव द्वितीय (Nraharidev II)...45.....11.......23
23 पूरनमाल (Pooranmal)..................44.....08.......07
24 कर्दवी (Kardavi)...........................44.....10........08
25 अलामामिक (Alamamik)...............50....11........08
26 उदयपाल (Udaipal).......................38....09........00
27 दुवानमल (Duwanmal)..................40....10.......26
28 दामात (Damaat)..........................32....00.......00
29 भीमपाल (Bheempal)...................58....05........08
30 क्षेमक (Kshemak)........................48....11........21

इसके बाद ....क्षेमक के प्रधानमन्त्री विश्व ने क्षेमक का वध करके राज्य को अपने अधिकार में कर लिया और उसकी 14 पीढ़ियों ने 500 वर्ष 3 माह 17 दिन तक राज्य किया जिसका विरवरण नीचे दिया जा रहा है।

क्र. शासक का नाम वर्ष माह दिन

1 विश्व (Vishwa)......................... 17 3 29
2 पुरसेनी (Purseni)..................... 42 8 21
3 वीरसेनी (Veerseni).................. 52 10 07
4 अंगशायी (Anangshayi)........... 47 08 23
5 हरिजित (Harijit).................... 35 09 17
6 परमसेनी (Paramseni)............. 44 02 23
7 सुखपाताल (Sukhpatal)......... 30 02 21
8 काद्रुत (Kadrut)................... 42 09 24
9 सज्ज (Sajj)........................ 32 02 14
10 आम्रचूड़ (Amarchud)......... 27 03 16
11 अमिपाल (Amipal) .............22 11 25
12 दशरथ (Dashrath)............... 25 04 12
13 वीरसाल (Veersaal)...............31 08 11
14 वीरसालसेन (Veersaalsen).......47 0 14

इसके उपरांत...राजा वीरसालसेन के प्रधानमन्त्री वीरमाह ने वीरसालसेन का वध करके राज्य को अपने अधिकार में कर लिया और उसकी 16 पीढ़ियों ने 445 वर्ष 5 माह 3 दिन तक राज्य किया जिसका विरवरण नीचे दिया जा रहा है।

क्र. शासक का नाम वर्ष माह दिन

1 राजा वीरमाह (Raja Veermaha)......... 35 10 8
2 अजितसिंह (Ajitsingh)...................... 27 7 19
3 सर्वदत्त (Sarvadatta)..........................28 3 10
4 भुवनपति (Bhuwanpati)...................15 4 10
5 वीरसेन (Veersen)............................21 2 13
6 महिपाल (Mahipal)............................40 8 7
7 शत्रुशाल (Shatrushaal).....................26 4 3
8 संघराज (Sanghraj)........................17 2 10
9 तेजपाल (Tejpal).........................28 11 10
10 मानिकचंद (Manikchand)............37 7 21
11 कामसेनी (Kamseni)..................42 5 10
12 शत्रुमर्दन (Shatrumardan)..........8 11 13
13 जीवनलोक (Jeevanlok).............28 9 17
14 हरिराव (Harirao)......................26 10 29
15 वीरसेन द्वितीय (Veersen II)........35 2 20
16 आदित्यकेतु (Adityaketu)..........23 11 13

ततपश्चात् प्रयाग के राजा धनधर ने आदित्यकेतु का वध करके उसके राज्य को अपने अधिकार में कर लिया और उसकी 9 पीढ़ी ने 374 वर्ष 11 माह 26 दिन तक राज्य किया जिसका विवरण इस प्रकार है ..

क्र. शासक का नाम वर्ष माह दिन

1 राजा धनधर (Raja Dhandhar)...........23 11 13
2 महर्षि (Maharshi)...............................41 2 29
3 संरछि (Sanrachhi)............................50 10 19
4 महायुध (Mahayudha).........................30 3 8
5 दुर्नाथ (Durnath)...............................28 5 25
6 जीवनराज (Jeevanraj).......................45 2 5
7 रुद्रसेन (Rudrasen)..........................47 4 28
8 आरिलक (Aarilak)..........................52 10 8
9 राजपाल (Rajpal)..............................36 0 0

उसके बाद ...सामन्त महानपाल ने राजपाल का वध करके 14 वर्ष तक राज्य किया। अवन्तिका (वर्तमान उज्जैन) के विक्रमादित्य ने महानपाल का वध करके 93 वर्ष तक राज्य किया। विक्रमादित्य का वध समुद्रपाल ने किया और उसकी 16 पीढ़ियों ने 372 वर्ष 4 माह 27 दिन तक राज्य किया !
जिसका विवरण नीचे दिया जा रहा है।

क्र. शासक का नाम वर्ष माह दिन

1 समुद्रपाल (Samudrapal).............54 2 20
2 चन्द्रपाल (Chandrapal)................36 5 4
3 सहपाल (Sahaypal)...................11 4 11
4 देवपाल (Devpal).....................27 1 28
5 नरसिंहपाल (Narsighpal).........18 0 20
6 सामपाल (Sampal)...............27 1 17
7 रघुपाल (Raghupal)...........22 3 25
8 गोविन्दपाल (Govindpal)........27 1 17
9 अमृतपाल (Amratpal).........36 10 13
10 बालिपाल (Balipal).........12 5 27
11 महिपाल (Mahipal)...........13 8 4
12 हरिपाल (Haripal)..........14 8 4
13 सीसपाल (Seespal).......11 10 13
14 मदनपाल (Madanpal)......17 10 19
15 कर्मपाल (Karmpal)........16 2 2
16 विक्रमपाल (Vikrampal).....24 11 13

टिप : कुछ ग्रंथों में सीसपाल के स्थान पर भीमपाल का उल्लेख मिलता है, सम्भव है कि उसके दो नाम रहे हों।

इसके उपरांत .....विक्रमपाल ने पश्चिम में स्थित राजा मालकचन्द बोहरा के राज्य पर आक्रमण कर दिया जिसमे मालकचन्द बोहरा की विजय हुई और विक्रमपाल मारा गया। मालकचन्द बोहरा की 10 पीढ़ियों ने 191 वर्ष 1 माह 16 दिन तक राज्य किया जिसका विवरण नीचे दिया जा रहा है।

क्र. शासक का नाम वर्ष माह दिन

1 मालकचन्द (Malukhchand) 54 2 10
2 विक्रमचन्द (Vikramchand) 12 7 12
3 मानकचन्द (Manakchand) 10 0 5
4 रामचन्द (Ramchand) 13 11 8
5 हरिचंद (Harichand) 14 9 24
6 कल्याणचन्द (Kalyanchand) 10 5 4
7 भीमचन्द (Bhimchand) 16 2 9
8 लोवचन्द (Lovchand) 26 3 22
9 गोविन्दचन्द (Govindchand) 31 7 12
10 रानी पद्मावती (Rani Padmavati) 1 0 0

रानी पद्मावती गोविन्दचन्द की पत्नी थीं। कोई सन्तान न होने के कारण पद्मावती ने हरिप्रेम वैरागी को सिंहासनारूढ़ किया जिसकी पीढ़ियों ने 50 वर्ष 0 माह 12 दिन तक राज्य किया !
जिसका विवरण नीचे दिया जा रहा है।

क्र. शासक का नाम वर्ष माह दिन

1 हरिप्रेम (Hariprem) 7 5 16
2 गोविन्दप्रेम (Govindprem) 20 2 8
3 गोपालप्रेम (Gopalprem) 15 7 28
4 महाबाहु (Mahabahu) 6 8 29

इसके बाद.......राजा महाबाहु ने सन्यास ले लिया । इस पर बंगाल के अधिसेन ने उसके राज्य पर आक्रमण कर अधिकार जमा लिया। अधिसेन की 12 पीढ़ियों ने 152 वर्ष 11 माह 2 दिन तक राज्य किया जिसका विवरण नीचे दिया जा रहा है।

क्र. शासक का नाम वर्ष माह दिन

1 अधिसेन (Adhisen) 18 5 21
2 विल्वसेन (Vilavalsen) 12 4 2
3 केशवसेन (Keshavsen) 15 7 12
4 माधवसेन (Madhavsen) 12 4 2
5 मयूरसेन (Mayursen) 20 11 27
6 भीमसेन (Bhimsen) 5 10 9
7 कल्याणसेन (Kalyansen) 4 8 21
8 हरिसेन (Harisen) 12 0 25
9 क्षेमसेन (Kshemsen) 8 11 15
10 नारायणसेन (Narayansen) 2 2 29
11 लक्ष्मीसेन (Lakshmisen) 26 10 0
12 दामोदरसेन (Damodarsen) 11 5 19

लेकिन जब ....दामोदरसेन ने उमराव दीपसिंह को प्रताड़ित किया तो दीपसिंह ने सेना की सहायता से दामोदरसेन का वध करके राज्य पर अधिकार कर लिया तथा उसकी 6 पीढ़ियों ने 107 वर्ष 6 माह 22 दिन तक राज्य किया जिसका विवरण नीचे दिया जा रहा है।

क्र. शासक का नाम वर्ष माह दिन

1 दीपसिंह (Deepsingh) 17 1 26
2 राजसिंह (Rajsingh) 14 5 0
3 रणसिंह (Ransingh) 9 8 11
4 नरसिंह (Narsingh) 45 0 15
5 हरिसिंह (Harisingh) 13 2 29
6 जीवनसिंह (Jeevansingh) 8 0 1

पृथ्वीराज चौहान ने जीवनसिंह पर आक्रमण करके तथा उसका वध करके राज्य पर अधिकार प्राप्त कर लिया। पृथ्वीराज चौहान की 5 पीढ़ियों ने 86 वर्ष 0 माह 20 दिन तक राज्य किया जिसका विवरण नीचे दिया जा रहा है।
क्र. शासक का नाम वर्ष माह दिन

1 पृथ्वीराज (Prathviraj) 12 2 19
2 अभयपाल (Abhayapal) 14 5 17
3 दुर्जनपाल (Durjanpal) 11 4 14
4 उदयपाल (Udayapal) 11 7 3
5 यशपाल (Yashpal) 36 4 27

विक्रम संवत 1249 (1193 AD) में मोहम्मद गोरी ने यशपाल पर आक्रमण कर उसे प्रयाग के कारागार में डाल दिया और उसके राज्य को अधिकार में ले लिया।

उपरोक्त जानकारी http://www.hindunet.org/
से साभार ली गई है जहाँ पर इस जानकारी का स्रोत स्वामी दयानन्द सरस्वती के सत्यार्थ प्रकाश ग्रंथ, चित्तौड़गढ़ राजस्थान से प्रकाशित पत्रिका हरिशचन्द्रिका और मोहनचन्द्रिका के विक्रम संवत1939 के अंक और कुछ अन्य संस्कृत ग्रंथों को बताया गया है।


नोट : इस पोस्ट को मैंने नहीं लिखा है और मैंने इसे इन्टरनेट से संकलित किया है क्योंकि मुझे ये अमूल्य जानकारी अपने साईट के द्वारा ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुँचाने की इच्छा हुई.

PICS: बॉलीवुड में तहलका मचाएगी न्यूड फोटोशूट कराने वाली 'इंडियन गर्ल'

Bollywood की ख़बरें 


मुंबई। गुजरे जमाने के बॉलीवुड सुपर स्टार राजेश खन्ना की लिव-इन-पार्टनर होने का दावा कर सुर्खियों में आईं अनीता आडवाणी लापता बताई जा रही हैं। वह दो दिन से बांद्रा (पश्चिम) स्थित 'मरियम हाउस' के अपने फ्लैट में नहीं आई हैं और न ही वह इसी इलाके में कार्टर रोड पर मौजूद 'काका' के 'आशीर्वाद' बंगले पहुंची हैं। खबर है कि राजेश खन्ना के दामाद अक्षय कुमार और अनीता आडवाणी के बीच 'आशीर्वाद' बंगले को लेकर समझौता हो गया है। लेकिन समझौते की शर्तों का खुलासा नहीं हुआ है। अनीता या खन्ना परिवार की ओर से किसी ने इस समझौते की पुष्टि भी नहीं की है।
Bollywood की ख़बरें 

भारतीय मूल की ऑस्ट्रेलियाई पॉप गायिका आएशा सागर जल्द ही अपना पांचवां म्यूजिक एल्बम लेकर आ रही हैं|
इस गायिका को भारत में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए हाल ही में गोल्ड कोस्ट शहर का सद्भावना दूत भी बनाया गया है। क्वींसलैंड में पली बढ़ी आयशा सागर गोल्ड कोस्ट के प्रति भारतीयों को लुभाने के लिए जल्द ही भारत आने वाली हैं।
वह इस कैम्पेन के लिए भारत तो आएंगी ही मगर यहां आकर वह मुंबई में बसने का भी सोच रही हैं| वह बॉलीवुड में सिंगिंग और एक्टिंग करना चाहती हैं|
Bollywood की ख़बरें 

हिंदी सिनेमा के दिग्गज अभिनेता अमिताभ बच्चन लंदन ओलंपिक के उद्घाटन समारोह से एक दिन पहले गुरुवार को ओलंपिक मशाल थामेंगे.
Bollywood की ख़बरें 
अभिनेता उदय चोपड़ा का कहना है कि आमिर खान जिस भी चीज को छूते हैं, वह सोना बन जाती है और 'धूम-3' में उनका होना फिल्म के लिए बढ़िया साबित होगा. 'धूम-3' में आमिर नकारात्मक किरदार निभा रहे हैं. वहीं अभिषेक बच्चन और उदय इस बार भी फिल्म में अपनी जय दीक्षित और अली की भूमिका में
आमिर खाननजर आएंगे.

उदय ने बताया, 'अब दबाव आमिर खान पर है. आमिर जिस भी चीज को छुते हैं, वह सोना बन जाती है और उनके साथ 'धूम' जैसी फिल्म में करना किसी और चीज से बड़ा है.'
'धूम' श्रृंखला के पहले दो संस्करणों को बॉक्स ऑफिस पर जबरदस्त कामयाबी मिली थी. वर्ष 2004 में आई 'धूम-1' में जॉन अब्राहम ने मुख्य भूमिका निभाई थी, तो वहीं 2006 में आई 'धूम-2' में उनकी जगह ऋतिक रोशन ने ली थी.
आमिर के अलावा 'धूम' श्रृंखला में आने वाले नए कलाकारों में कैटरीना कैफ भी शामिल हैं. आदित्य चोपड़ा निर्मित यह फिल्म 2013 में प्रदर्शित होगी.
Bollywood की ख़बरें 
फ्रीडा ने कहा, 'मुझे लगता है कि सफर बहुत सुंदर है लेकिन बहुत दुखद भी है, क्योंकि यह शुरुआत में बहुत मासूमियत से शुरू होता है और बाद में हताशा की स्थिति में चला जाता है.' उन्होंने न्यूयार्क से फोन पर बताया कि उन्हें लगता था कि तृष्णा एक कठिन किरदार है क्योंकि यह उनके वास्तविक जीवन से बहुत अलग था.
अभिनेत्री फ्रीडा पिंटो का कहना है कि उनकी फिल्म 'तृष्णा' बहुत खूबसूरत लेकिन दुखद कहानी है. फिल्म एक ऐसी लड़की की कहानी है, जो पारम्परिक परवरिश और एक आधुनिक भारत की लड़की के सपनों के बीच फंसी होती है. माइकल विंटरबोटम की यह नई फिल्म थॉमस हार्डी के प्रतिष्ठित उपन्यास 'टीस ऑफ द डी'उर्बेरविलेस' पर आधारित है, जिसे राजस्थान के ग्रामीण परिवेश में फिल्माया गया है. इसमें पिंटो, तृष्णा नाम की लड़की का मुख्य किरदार निभा रही हैं. तृष्णा एक ऑटो चालक की बहन होती है, जो एक अमीर लड़के के साथ प्रेम में पड़ जाती है.
फ्रीडा पिंटोअपने किरदार की तैयारी के लिए फ्रीडा ने राजस्थान के ओसियन गांव में एक परिवार के साथ कुछ समय बिताया था और ऐसी लड़कियों का साक्षात्कार भी लिया था, जो होटलों में काम करती हैं और एयरलाइंस में ग्राउंड कर्मचारियों के रूप में कार्यरत हैं.
डैनी बॉयल के निर्देशन में बनी अपनी पहली फिल्म 'स्लमडॉग मिलियनेयर' से सुर्खियों में आई फ्रीडा ने कहा कि बॉयल और विंटरबोटम दोनों बहुत अद्भुत फिल्मकार हैं और दोनों के काम करने की शैली भी अलग है.' अभिनेत्री ने कहा कि दोनों फिल्में एकदम अलग हैं. 'स्लमडॉग मिलियनेयर' एक प्रेम कहानी है, जो अंत में उम्मीदों से भरा एक सुंदर संदेश देती है. लेकिन 'तृष्णा' एक दुखद प्रेम कहानी है, जो दुख से भरी है.'



कारगिल के शहीदों  को शत शत नमन ........... आज है कारगिल दिवस .......23 जुलाई 

KARGILL

  26 जुलाई  : कारगिल के शहीदों के नाम एवं कारगिल फतेह 


कुछ  यादे !: -
  • दो मई, 1999 - चरवाहों ने कुछ घुसपैठियों को देखा
  • 10 मई - कई और जगहों पर भारतीय सीमा में अतिक्रमण देखा गया
  • 26 मई - ऑपरेशन विजय शुरु हुआ.
  • 27 मई - भारतीय वायुसेना के दो विमान मार गिराए गए.
  • एक जून - पाकिस्तान की ओर से राष्ट्रीय राजमार्ग पर बमबारी
  • तीन जून - रेड क्रॉस ने लेफ़्टिनेंट नचिकेता को भारत को सौंपा

टाइगर हिल पर क़ब्ज़ा

  • छह जून - भारत ने पाकिस्तानी विदेश मंत्री सरताज अजीज को दिल्ली आने से मना किया.
  • 8 जून - प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने राष्ट्र को संबोधित किया.
  • 13 जून - तोलोलिंग पर भारतीय सेना ने क़ब्ज़ा किया.
  • चार जुलाई - टाइगर हिल पर भी भारत का क़ब्ज़ा.
  • पांच चुलाई - क्लिंटन- नवाज शरीफ़ का साझा बयान, पाकिस्तान पीछे हटने को तैयार
  • 11 जुलाई - पाकिस्तानी सेना का हटना शुरु.
  • 26 जुलाई - भारतीय सेना प्रमुख एनसी विज़ ने ऑपरेशन विजय ख़त्म करने की घोषणा की.


कारगिल  युद्ध  की ग्यारहवी वर्षी  है । यह वही लड़ाई थी जिसमें पाकिस्तानी सेना ने द्रास-कारगिल की पहाड़ियों पर कब्जा करने की कोशिश की थी। भारतीय सेनाओं ने इस लड़ाई में पाकिस्तानी सेना तथा मुजाहिदीनों के रूप में उसके पिट्ठुओं को परास्त किया। आम तौर पर कारगिल युद्ध को भी 1947-48 तथा 1965 में पाकिस्तानी सेना द्वारा कबीलाइयों की मदद से कश्मीर पर कब्जा करने की कोशिशों के एक अंग के रूप में देखने की प्रवृत्ति रही है। वास्तव में कारगिल युद्ध कश्मीर हथियाने और भारत को अस्थिर करने के जिहादियों के 20 वर्ष से जारी अभियान का एक महत्वपूर्ण बिंदु है और यह अनेक मामलों में पहले की दोनों लड़ाइयों से भिन्न है। यह युद्ध तब लड़ा गया जब पाकिस्तान ने नाभिकीय हथियार प्राप्त कर लिए थे और इस प्रकार इस्लामाबाद ने भारत के साथ एक प्रकार के प्रतिरोधक संबंध विकसित कर लिए थे। पाकिस्तान के पास दसियों हजार मुजाहिदीन भी थे, जो उसके एक इशारे पर भारत के खिलाफ जूझने के लिए तैयार थे। इन मुजाहिदीनों को कट्टरपंथ का पाठ पढ़ाकर लड़ाई के लिए तैयार किया गया था। एक बिंदु पर उन्हें सीआईए का समर्थन भी मिलता रहा और सऊदी अरब से धन भी। मुजाहिदीनों में पश्तून आदिवासी, अरब, मध्य एशियाई और अन्य स्थानों के मुस्लिम शामिल हैं। पाकिस्तान ने जब से नाभिकीय हथियार प्राप्त किए हैं तब से ही वह कश्मीर को हथियाने का सपना देखता रहा है। वे कहते भी हैं कि हमारे नाभिकीय हथियार भारत का मुकाबला करने के लिए हैं। कुछ अन्य लोग यह भी कहने का साहस रखते हैं कि नाभिकीय हथियार वह छाता हैं जिनके अंदर पाकिस्तान कश्मीर मामला फिर से खोल सकता है। उन्हें यह भरोसा है कि नाभिकीय हथियारों के कारण वे भारत की बराबरी पर आ गए हैं। इनकी मदद से पाकिस्तान का इरादा तब कश्मीर पर कब्जा जमाने की कोशिश करना है जब भारतीय नेतृत्व कमजोर और अनिर्णय की स्थिति में हो।
इस दृष्टिकोण के साथ पाकिस्तान ने उस समय अपना अभियान आगे बढ़ाने का फैसला किया जब दिसंबर 1989 में वीपी सिंह ने प्रधानमंत्री के रूप में सत्ता संभाली। तब पाकिस्तान ने सैकड़ों घुसपैठिए कश्मीर में भेज दिए। इसके साथ ही पाकिस्तान के विदेश मंत्री याकूब खान ने नाभिकीय धमकी भी दी। वीपी सिंह सरकार न तो कमजोर साबित हुई और न ही अनिर्णय की शिकार। 1991 से 1999 के बीच पाकिस्तान ने कश्मीर में अनगिनत जिहादी अभियान चलाए, जिनमें सैकड़ों निर्दोष लोग और सुरक्षा कर्मी मारे गए। फिर भी पाकिस्तान को सफलता नहींमिली। 1998 में भारत के नाभिकीय परीक्षण के बाद पाकिस्तान ने भी ऐसा ही किया। इस समय तक पाकिस्तान ने काबुल में अपनी कठपुतली तालिबानी सत्ता स्थापित कर दी थी। ओसामा बिन लादेन अफगानिस्तान में बहुत अधिक मजबूत हो गया था। इसके साथ ही कश्मीर में आतंक फैला रहे संगठन भी लादेन के जिहादी आतंक का हिस्सा बन गए। कश्मीर में लश्कर, हरकत उल मुजाहिदीन, जैशे मोहम्मद और ऐसे ही अन्य आतंकी संगठनों की मौजूदगी में पाकिस्तान ने कारगिल घुसपैठ के जरिए कश्मीर को हड़पने की कोशिश की। पाकिस्तान यह भी जानना चाहता था कि नई दिल्ली में भाजपा नीत राजग सरकार मजबूत है या नहीं? पाकिस्तानी सेना को लाहौर शांति प्रक्रिया से यह भ्रम हो गया कि भारत में एक कमजोर सरकार सत्ता में है। नवाज शरीफ ने बाद में भले ही खुद को कारगिल प्रकरण से अलग करने की कोशिश की हो, लेकिन यह यथार्थ है कि वह कश्मीर पर कब्जा जमाने की इस कोशिश में अपनी सेना के साथ थे। भारत में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार ने न केवल कारगिल हमले का अत्यंत मजबूती से जवाब दिया, बल्कि अतुलनीय संयम का परिचय देते हुए अंतरराष्ट्रीय ख्याति भी बटोरी। सभी बड़े देशों ने वाजपेयी सरकार के रुख की सराहना की। कारगिल में पाकिस्तानी घुसपैठ को विफल बनाने के लिए भारतीय थल सेना और वायुसेना ने समन्वय से कार्य किया और उन घुसपैठियों को उखाड़ फेंका जो कश्मीर को हड़पने का मंसूबा पाले हुए थे। महत्वपूर्ण यह था कि भारतीय सेनाओं ने हमले का जवाब देते हुए एक बार भी नियंत्रण रेखा पार नहीं की। पाकिस्तान को यह उम्मीद थी कि वह इस प्रकरण के साथ कश्मीर मामले का अंतरराष्ट्रीयकरण करने के साथ इसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में ले जाने में सफल रहेगा, लेकिन उसका यह मंसूबा भी इसलिए धरा रह गया, क्योंकि संघर्ष पूरी तरह भारतीय सीमा क्षेत्र में हो रहा था। उस समय भारत की तीनों सेनाएं पाकिस्तान के किसी अन्य बड़े हमले का सामना करने के लिए पूरी तरह तैयार थीं। कारगिल मामले में पाकिस्तान कूटनीतिक रूप से पूरी तरह अलग-थलग हो गया। भारतीय वायुसेना की सक्रियता के कारण पाकिस्तानी सेना आगे बढ़ने में पूरी तरह असफल हो गई। कारगिल में पाकिस्तान का दुस्साहस उसके लिए बेहद अपमानजनक स्थितियों में समाप्त हुआ।
इसके बाद ही पाकिस्तानी सेना ने अपने यहां निर्वाचित सरकार को उखाड़ फेंका। पाकिस्तानी सेना ने कश्मीर पर कब्जा जमाने के अपने मिशन को त्यागा नहीं है। जिहादी आतंकवाद उसके लिए अभी भी इस मिशन को पूरा करने का माध्यम बना हुआ है। मुंबई में हुआ आतंकी हमला भी समुद्र मार्ग से पाकिस्तान की तरफ से आए जिहादियों का कारगुजारी थी। कारगिल युद्ध पाकिस्तानी सेना द्वारा छद्म रूप से चलाए गए अभियान की न तो शुरुआत थी और न ही अंत। इस युद्ध में भारत की जीत ने पाकिस्तानी सेना को यह सबक जरूर दिया कि वह सीधे तौर पर किसी लड़ाई में भारत को पराजित नहीं कर सकती, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि आईएसआई और पाकिस्तानी सेना ने भारत को रक्तरंजित करने के अपने मंसूबे त्याग दिए हैं। कारगिल युद्ध अमेरिका के दृढ़ और निष्पक्ष रुख के लिए भी याद किया जाएगा, जो भारत और अमेरिका के बीच संबंधों में सुधार का प्रस्थान बिंदु भी बना।

Kargil Diwas

कारगिल लडाई क्या थी ? कहाँ हुयी ? कुछ विशेष  हाई लाइटस 



ये गांव हैं पनद्रास। मशहूर युद्व मैदान द्रास के ठीक पहले। राजमार्ग और नियंत्रण रेखा की पहाड़ियों के बीच आम तौर पर पत्थरों के बने घरों वाले इस गांव में अब भी दस साल पहले हुए युद्व की यादे ताजा है।

पनद्रास के निवासी याद करते है कि कैसे गांव के ठीक ऊपर की पहाड़ी पर पाकिस्तानी सेना के लोग घुसपैठियों की शक्ल में घुस आए थे और गांव पर बम बरसाने शुरू कर दिए थे। उस समय तक राजमार्ग पर काफिले निकल रहे थे और फौजों का आना जाना जारी था। फौजों के इन्हीं ट्रकों ने गांव वालों को निकाल कर सुरक्षित जगहों पर पहुंचाया। ज्यादातर जंस्कार नदी के किनारे गोमा कारगिल नाम के एक बौद्व मठ के पास मैदान में महीनों पड़े रहे।

इस गांव के लोग नाराज है कि भारतीय सेना का सामान उठाने में उन्होंने मदद की। बाहर से आए सैनिकों को पास की ही टाइगर हिल तक पहुंचने के आसान रास्ते बताए मगर जब जंग पूरी हो गई तो सरकार उन्हें भूल गई। पास में ही करा़ेडों रुपए लगा कर विजय स्मारक बनाया गया मगर गांव की सुरक्षा के लिए पहाड़ी पर भारतीय सेना का कोई बंकर तक नहीं है।

सरकार ने लिया हो या न लिया हो, गांव वालों दस साल पहले की उस विश्वासघाती लड़ाई से सबक लिया है। उन्होंने घरों में बंकर बनाए हैं और ऐसा एक घर में नहीं किया गया है। अगली बार अगर कभी बमबारी हो तो ये लोग अपनी सुरक्षा के लिए खुद तैयार है।

युद्व की शुरूआत तो इस गांव ने देखी थी मगर फिर सेना ने गांव खाली करवा दिया। इसके बाद ये गोलों की आवाज और दहशत का नजारा दूर से देखते और सुनते रहे। लौट कर आए तो गांव तहस नहस हो चुका था और जानवर मर चुके थे। वह साल की एक मात्र फसल का मौसम था और वह फसल भी नष्ट हो गई थी।

कुछ लोगों की पहल से ये गांव वाले श्रीनगर पहुंचे जहां इनकी कोई सुनवाई नहीं हुई। इसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को जानने वाले एक पत्रकार की मदद से ये दिल्ली गए। वहां अटल बिहारी वाजपेयी से मिले और अपना दुख बयान किया। श्री वाजपेयी ने पूरे एक घंटे इनकी बात सुनी, साथ तस्वीर खिंचवाई और कश्मीर सरकार को रकम दे कर मदद करने का वादा किया। मगर गांव वाले याद नहीं कर पाते कि कभी कोई मदद उन्हें मिली हो।

सदियों और पीढ़ियों से नियंत्रण रेखा के पास एक पर्वत की छाया में रह रहे ये लोग अब भी किसी सरकार के भरोसे नहीं है। सेना वाले छोटी मोटी जरूरतों और आपत्तियों में मदद कर देते हैं लेकिन गांव वाले अपने भरोसे ही है। ये सिर्फ एक गांव की कहानी है लेकिन नियंत्रण रेखा पर ऐसे बहुत सारे गांव है।

बोर्ड पर साफ लिखा 
ै कि ये दुनिया की दूसरे नंबर की सबसे ठंडी जगह है जहां लोग रहते है। यह द्रास का बाजार है और पीछे है जम्मू कश्मीर पर्यटन विभाग का डाक बंगला।


कारगिल युद्व में तोप के दो गोले टाइगर हिल से यहां भी गिरे थे। एक को छा़ेड कर सभी कमरे नष्ट हो गए थे। डाक बंगले के बाहर स्वागत का एक बहुत बड़ा बोर्ड जरूर लगा है। नए कमरे बना कर उसका विस्तार भी किया जा रहा है। मगर डाक बंगले में चौकीदार तक नजर नहीं आया। किसी के ठहरने की तो बात ही दूर है।

द्रास के बाजार में वह सभी मिलता है जो देश के दूसरे छोटे बाजारों में मिलता है। लद्दाख का यह इलाका बौद्व और शिया मुस्लिमों से भरा है और यहां इस्लाम की सूफी परंपरा का पालन होता है। कई छोटे मोटे होटल खुले हैं जहां लोग लेह या कारगिल से आते या जाते हुए रात हो जाने पर ठहरते है और यही इन दुकानदारों और इन होटल वालों की आजीविका का एक मात्र साधन है।

फौजियों से द्रास के लोगों की अब अच्छी दोस्ती हो गई है और सेना के लोग अपने घर फोन करने और जरूरत की चीजे खरीदने आते है। यह बाजार बहुत छोटा सा है लेकिन यह सोच कर ही दहशत होती है कि यह हिस्सा कारगिल युद्व के दौरान पाकिस्तानी फौजों के सीधे निशाने पर था।

द्रास के बाजार के आगे फिर पारिवारिक माहौल और सन्नाटा है। पहाड़ों से पिघल कर गिरती हुई बर्फ है और उसी ठंडे पानी से बनी जंस्कार नदी है। यह नदी आगे जा कर उस सिंधु नदी में मिल जाती है और भारत को उसका नाम देने वाली सिंधु नदी पाकिस्तान में चली जाती है। एक छोटे लहराते हुए खतरनाक रास्ते पर लगातार समाधि लेख नजर आते है। ये समाधियां उन सैनिकों की है जो देश को बचाने का जतन करते हुए खाईयों में गिर कर या दुश्मन की फायरिेंग से मारे गए है। द्रास से कारगिल के बीच के रास्ते पर अब भी बोर्ड लगे हैं कि आप दुश्मन की नजर में है। नदी के उस पार पाकिस्तान है और इस तरफ भारत का एक बहुत महत्वपूर्ण रास्ता जो खुद भारतीय फौजों के अनुसार असुरक्षित है।

आसमान से बाते करती बर्फ से जुलाई के महीने में भी ढकी एक चोटी नाम है टाइगर हिल। कुछ याद आया आपको? ये वही टाइगर हिल है जिस पर बैठे पाकिस्तानी शैतानों ने इस राजमार्ग पर कब्जा करने के लिए सबसे ज्यादा हमले किए थे और जिस वापस जीतने के लिए भारतीय सेना को ४० लोगों की जान गवानी पड़ी थी और यह कारगिल युद्व का सबसे विकट ऑपरेशन था।

ध्यान से देखिए। पहाड़ की चोटी तक पहुंचने का कोई सुगम रास्ता नहीं है। बर्फ बहुत धोखेबाज है और एक बार फिसले तो पता नहीं किस खाई में जा कर गिरेंगे। फिर भी वायुसेना की मदद से ८ जुलाई १९९९ को ग्रेनेडियर रेजीमेंट की १८वीं बटालियन ने टाइगर हिल से पाकिस्तानियों को खद़ेड दिया था। सिर्फ इस एक लड़ाई के एक परमवीर चक्र और दो महावीर चक्र दिए गए थे।

१९९८ में यानी युद्व के कुछ महीने पहले कारगिल में एक युद्व अभ्यास किया गया था। उसी दौरान बड़े अधिकारियों को बता दिया गया था कि टाइगर हिल की चोटियों पर पाकिस्तान कब्जा करने की कोशिश कर रहा है। ३० जनवरी १९९९ को तीसरी इन्फेंटरी डिवीजन के मेजर जनरल वी एस बुधवार को कमांडरों ने एक पत्र लिख कर ये चेतावनी दी थी। पत्र पर कर्नल पुष्पेंद्र ओबेराय के दस्तखत थे। आश्चर्यजनक रूप से एक्सरसाइज जांच नाम के इस युद्व अभ्यास में मुख्य भूमिका निभाने वाले कर्नल ओबेराय को बजरंग नाम की एक चोटी खाली कर देने का इल्जाम लगा कर सरेआम वर्दी उतार कर सेना से निकाल दिया गया था।

चेतावनी की इस चिट लिखा हुआ था कि जब तक टाइगर हिल पर पाकिस्तानियों का कब्जा रहेगा तब तक राष्ट्रीय राजमार्ग वन डी सुरक्षित नहीं है। मगर पता नहीं क्यों इस पत्र पर ध्यान नहीं दिया गया। नतीजे में टाइगर हिल को फिर से पाने के लिए सबसे ज्यादा जाने गंवानी पड़ी। पाकिस्तानी परियों का तालाब की ओर से आए थे और आखिरी दम तक लड़े थे। बाद में उनके सैनिक अपनी साथियों के लाशे तक छा़ेड गए थे जिन्हें भारतीय सेना ने बाइज्जत वापस किया। आश्चर्यजनक रूप से कारगिल युद्व की जांच करने वाली समिति ने कहीं भी एक्सरसाइज जांच नाम के युद्वाभ्यास का कोई जिक्र तक नहीं किया। अब टाइगर हिल पर सर्दियों में भी अपार बर्फ के बीच शून्य से ७० डिग्री नीचे नाम मात्र की आक्सीजन में भारतीय सैनिक पहरा देते है। कारगिल के विश्वासघात से भारतीय सेना ने यह सबक जरूर सीखा है।

द्रास और कारगिल के बीच बनाया गया है विजय स्मारक। तोलोलिंग और थ्री पिंपल्स नाम की पहाड़ियों के बीच बने इस स्मारक की दीवारों पर वे हजारों नाम है जो टाइगर हिल और इन पहाड़ियों को बचाने में शहीद हो गए।

ये लोग देश के हर कोने से आए थे। ये लड़े और आखिरी सांस तक लड़े। दुश्मन की गोलिया सीने पर खाई और आखिरकार कर चले हम फिदा जानो तन साथियों, अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों का नारा बुलंद कर के ताबूतों में बंद हो कर अपने अपने घर के पास के मरघट या कब्रिस्तान तक पहुंच गए।

२६ जुलाई को यहां हर साल विजय दिवस मनाया जाता है। सैनिकों की वीरता की कहानियां कही जाती है। अक्सर रक्षा मंत्री आते हैं और उस हैलीपैड पर हैलीकॉप्टर से उतरते हैं जो इसी लड़ाई में शहीद हुए सिर्फ २२ साल के कैप्टन विजयंत थापर की याद में बनाया गया है। शहीद विजयंत थापर को वीर चक्र दिया गया था।

मरने के पहले विजयंत थापर अपने परिवार के नाम एक पत्र छा़ेड गया था जिसमें उसने गर्व से कहा था कि वह या तो जीतेगा या फिर जिंदा नहीं लौटेगा। इस हैलीपैड का उद्घाटन शहीद विजयंत के पिता कर्नल वी एन थापर ने किया है। कर्नल थापर भी वीरता के लिए वीर चक्र प्राप्त कर चुके हैं।

दस साल पहले लड़ाई का निशाना कारगिल शहर नहीं था। हालांकि गोले यहां भी गिरे लेकिन ज्यादा नुकसान नहीं हुआ। मगर इसी कारगिल शहर में युद्व से बेघर हुए शरणार्थियों का सबसे बड़ा बसेरा बना हुआ था।

आज कारगिल शहर अपनी रफ्तार चल रहा है। दुकाने खुली है, बाजार में ठीक ठाक चहल पहल है। बटालिक छावनी की तलहटी में बसे इस छोटे से शहर से सिर्फ पचास किलोमीटर दूर पाकिस्तान का स्कार्दू है जो वहां का एटमी जखीरा रखता है। वैसे कारगिल से पाकिस्तान की जमीन बहुत दूर नहीं है। था़ेडी ऊंचाई पर खड़े हो कर पाकिस्तान नजर आ जाता है। बीच में सिंधू नदी बहती है और उस पार पाकिस्तान है।

१९७१ में कारगिल के साथ अन्याय हुआ था। भारतीय सैनिकों ने अपनी जान पर खेल कर और जान गंवा कर जो इलाका जीता था वह शिमला समझौते में वापस कर दिया गया। कारगिल बारूद की नदी के किनारे बैठा है। मगर यहां के लोग हिम्मत दिखा रहे हैं। इसके बावजूद सरकार खासे नाराज नजर आते है। 



कारगिल शहर का था़ेडा विकास तो हुआ है लेकिन सड़के ठीक हो जाने और कुछ नई इमारते बन जाने के अलावा इस विकास की शक्ल नजर नहीं आती। कोई सवा लाख आबादी वाले कारगिल में आज तक आतंकवाद की कोई घटना नहीं हुई। यहां शिया पंथ और बौद्व दोनों का जोर है और ईरान के धर्म गुरू और शासक रहे अयातुल्ला खोमैनी की तस्वीरे जगह जगह नजर आ जाती है।


१९४७ की भारत पाक लड़ाई के दौरान भी कारगिल के द्रास और जोजिला इलाके में भयंकर युद्व हुआ था और १९६५ की लड़ाई में दो बार पाकिस्तान के कब्जे से कारगिल का बहुत बड़ा हिस्सा भारत के कब्जे में आ गया था। मगर संयुक्त राष्ट्र के कहने पर इसे वापस करना पड़ा। १५ अगस्त १९६५ को भारतीय सेनाओं ने कारगिल फिर छिन लिया मगर ताशकंद में हुए समझौते के दौरान लाल बहादूर शाी ने जिद कर के कारगिल को वापस प्राप्त कर लिया।

कारगिल शहर के लोग अब भी नहीं मानते कि वे सुरक्षित है मगर ये जज्बा उनमें अब भी कायम है कि अगर हमला हुआ तो हमेशा की तरह भारतीय सेना उन्हें सुरक्षित बचा लेगी। अब यहां एक हवाई अड्डा भी बन गया है मगर उड़ान सप्ताह में सिर्फ एक है। ये उड़ान भी तभी चलती है जब जो-जिला पास का रास्ता बर्फ से बंद हो जाता है।

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